IPL

Hanso Hansao Khoon Badhao

101 Posts

2965 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 652 postid : 1387

हामिद का चिमटा

Posted On: 6 Dec, 2011 Others में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

HKC2

साथियों अभी पिछले कई दिनों से टी वी पर मैं किसी चोकलेट कम्पनी का विज्ञापन देख रहा हूँ, जहाँ पर एक परिवार रात का खाना खा रहा है, और खाने के बाद एक नन्ही सी प्यारी बच्ची से उसकी दादी उसे छेड़ते हुए मीठे के नाम पर उसकी चोकलेट मांग रही है, और वह प्यारी सी बच्ची अपनी चोकलेट न देने के बहाने बना रही है और पूरा परिवार उसकी प्यारी सी चोकलेट बचाऊ कोशिश पर हंस रहा है ! काफी अच्छा विज्ञापन लगा मुझे ये, मगर चूँकि मैं राईटर हूँ और ये विज्ञापन बार – बार मुझे कुछ सोचने पर मजबूर कर रहा था, और मैं काफी उतावला हो रहा था कि आखिर क्यों ये विज्ञापन मेरे जेहन से नहीं निकल रहा है, इस विज्ञापन से मेरे बचपन की कौन सी याद जुडी है जो मुझे याद नहीं आ रही है, मगर जब मैं रात को सोने लगा तब मैंने शांति से अपने अतीत के पन्ने पलटे तो मुझे मेरे बचपन मैं हिंदी की किताब नव भारती मैं पढ़ी हुई एक कहानी याद आई, तब मुझे समझ मैं आया की आखिर इस विज्ञापन और मेरी याद का क्या रिश्ता है !  हो सकता है आप मैं से भी कुछ लोगों ने ये कहानी पढ़ी हो मगर जब याद आ ही गई है तो अपना लेखक होने का फायदा उठाते हुए मैं आप सबको भी बचपन की अपनी ये पसंदीदा कहानी पढाता हूँ…..


( ये कहानी महान लेखक मुंशी प्रेमचंद की कहानी ईदगाह से ली गई थी, और हो सकता है असली कहानी और मुझे इस वक्त जो कहानी याद आ रही है उसके मूल मैं उसके चरित्रों मैं कुछ अंतर हो क्योंकि कहानी मुझे अक्षरश याद नहीं इसलिए इसे कहानी का रूप देने के लिए कुछ शब्द मैंने अपनी ओर से भी जोड़ने का प्रयास किया है ! किन्तु कहानी का मूल सार आज भी मुझे याद है, जो कि यहाँ मैं प्रस्तुत करने की कोशिश कर रहा हूँ. अत : कोई भी गलती होने पर क्षमाप्रार्थी हूँ .. )


किसी छोटे से गांव मैं एक छोटा सा प्यारा बच्चा हामिद अपनी बूढी दादी माँ के साथ रहता था! एक बार की बात है ईद आने वाली थी और इसलिए पास के गांव मैं मेला लगा, रविवार का दिन था गाँव के सारे बच्चे खुशी – खुशी मेला देखने के लिए तैयार हो रहे थे और अपने – अपने माता – पिता के साथ मेला देखने जाने वाले थे ! नन्हे हामिद का भी मन किया मेला देखने के लिए उसने अपनी दादी से कहा दादी मैं भी अपने दोस्तों के साथ मेला देखने जाऊंगा ! गरीब दादी के पास पैसे नहीं थे इसलिए उसने हामिद को समझाने का प्रयास किया किन्तु हामिद के जिद करने पर उसकी दादी ने अपने पास रखा अंतिम एक रुपया हामिद को देते हुए कहा बेटा ये रुपया बड़ी संभाल कर रखना और इसे अच्छी तरह से खर्च करना कोई अनाप – शनाप खर्च न करना ! जब तुझे भूख लगे तो कुछ पैसे खाने पर खर्च करना और बाकी पैसों से अपने लिए कोई खिलौना खरीद लेना ! मेले की अनुमति और रुपया पाकर हामिद की खुशी का ठिकाना नहीं रहा ! वह भी अपने मित्रों के साथ खुशी – खुशी मेला देखने चल दिया ! मेले मैं पहुंचकर सभी बच्चे खूब मजे कर रहे थे, जगह – जगह, खाने – पीने कि चीजें थीं और खिलौनों की दुकाने थीं सभी बच्चे कुछ न कुछ खा रहे थे और खिलौने खरीद रहे थे, हामिद का मन भी बहुत कर रहा था मगर हामिद के पास सिर्फ एक रुपया था और उसे अपनी दादी की सीख याद आ रही थी बेटा इसे बहुत सोच समझकर खर्च करना, इसीलिए हामिद ने अब तक अपना एक रुपया बचा कर रखा था, मेले मैं घूमते हुए हामिद को एक बर्तन की दुकान दिखाई दी ! हामिद उस ओर बढ़ चला उसने पूरी दुकान मैं देखने के बाद एक लोहे का चिमटा उठाया और दुकानदार से उसका दाम पूछा ! दुकानदार ने उसका दाम एक रूपए बताया मासूम हामिद बहुत मायूस हो गया, क्योंकि उसके पास सिर्फ एक ही रुपया था, और उसका जी चाह रहा था कि वह भी और बच्चों की तरह खाए – पिए और खिलौने ले, किन्तु वह अपनी दादी के लिए चिमटा भी खरीदना चाहता था क्योंकि हामिद की आँखों मैं तबे पर रोटी सेकती उसकी दादी का चेहरा आ रहा था जिसकी उँगलियाँ चिमटा न होने की वजह से  रोज ही तबे से जल जाती थीं, इसलिए हामिद अपनी दादी के लिए चिमटा खरीदकर उसकी उँगलियों को जलने से बचाना चाहता था ! मगर इसके लिए हामिद को अपनी खुशियों का त्याग करना पड़ेगा, एक तरफ हामिद की अपनी खुशिया थीं दूसरी ओर रह – रह कर उसकी दादी की जलती उंगलियों का ख्याल ! अंत मैं नन्हे हामिद ने वीरता दिखाते हुए, दुकानदार से वह चिमटा खरीद लिया, और शान से उसे अपने काँधे पर रखकर पूरे मेले मैं यों ही घूमता रहा ! शाम हो चली थी सभी लोग एक जगह एकत्र हो वापस गाँव की ओर लौटने लगे ! हामिद के सभी मित्र हामिद का मजाक उड़ा रहे थे कि उसने ये क्या ले लिया चिमटा ! कोई उसे मिटटी का शेर दिखाता, तो हामिद उससे कहता तुम्हारा ये मिटटी का शेर २ दिन मैं टूट जायेगा किन्तु मेरा चिमटा असली शेर से भी लड़ने का काम आएगा ! यों ही हंसी मजाक करते करते सभी बच्चे अपने गाँव वापस आ गए ! घर मैं हामिद की दादी बेसब्री से हामिद का इन्तजार कर रही थी, आते ही उसने हामिद से बड़े उल्लास से पूछा मेरे लाल ने मेले मैं क्या – क्या किया और अपने लिए कौन सा खिलौना ख़रीदा ? हामिद ने झट से चहकते हुए दादी के हाथ मैं चिमटा थमा दिया ! चिमटा देखते ही दादी आग – बबूला हो उठी , बोली कमबख्त ये क्या उठा लाया तेरे पास एक ही रुपया था फिर तूने ये चिमटा क्यों ख़रीदा ! इसका क्या करेगा तू और दादी ने हामिद का चिमटा गुस्से से दूर फेंक दिया ! मासूम हामिद ने चिमटा उठाया और फिर से अपनी दादी से लिपट गया और बोला दादी ये मैं अपने लिए नहीं आपके लिए लाया हूँ ! अब रोटी सेंकते बक्त कभी भी आपकी उँगलियाँ नहीं जलेंगी ! अपने पोते की बात सुनकर बूढी दादी की ऑंखें डबडबा उठीं, दादी अपने पोते के प्यार से भाव बिभोर हो उठी और हामिद को अपने कलेजे से लगा लिया ! बेटा इतने बड़े मेले मैं भी तू अपनी बूढी दादी को नहीं भूला ! और अपनी खुशियों का त्याग करके तुझे तेरी बूढी दादी की उँगलियों को जलने से बचाने के लिए चिमटा खरीद लाया ! बूढी दादी की आँखों मैं खुशी देखकर मासूम हामिद भी खुशी से चहक उठा और बोला दादी मुझे बहुत भूख लग रही है आज आप इसी चिमटे से सेंक कर मुझे रोटी खिलाना ! दादी ने एक बार फिर हामिद को अपने सीने से लगा लिया……..!

साथियों इस कहानी को जब भी याद करता  हूँ और आज जब ये विज्ञापन देखता हूँ, तो सोचता हूँ क्यों, आखिर क्यों आज हम अपनी आने वाली पीढ़ी को हामिद जैसी त्याग और स्नेह की कहानियों से दूर और दूर करते जा रहे हैं, और आज के बच्चों को सिर्फ पाने की संस्कृति सिखा रहे हैं त्याग करने की नहीं ! इसका असर ये होता जा रहा है की समाज मैं आज हर कोई एक दुसरे से पाने की अभिलाषा रखता है, जिसकी बजह से आज समाज मैं काफी कुरीतियाँ फ़ैल रही हैं, यदि त्याग का एकांश भी व्यक्ति मैं बचपन से ही प्रवेश कर जाए तो वह ताउम्र उसको एक अच्छा नागरिक बनने मैं सहायक होगा ! आज की कुछ पीढ़ी भी त्याग कर रही है अपनी संस्कृति का ! अपने सादा जीवन का और कहीं – कहीं तो अपने जन्म देने वाले माता – पिता का भी ! ऐसी घटनाएं जब भी सुनता हूँ तो मुझे ये कहानी याद आती है और सोचता हूँ जब नन्हा सा हामिद अपना एक मात्र रुपया भूखा प्यासा रहकर, अपनी खुशियों को त्याग कर अपनी दादी की परेशानी दूर करने के लिए त्याग कर सकता है तो फिर क्यों आज के कई लोग माँ – बाप और अपने बुजुर्गों के लिए त्याग तो दूर उनका ही त्याग कर रहे हैं ! क्यों वे अपनी कमाई का एक छोटा सा हिस्सा भी अपनों के लिए त्यागना नहीं चाहते ! त्याग एक ऐसी चीज है जो आज के युग मैं सिर्फ किताबों मैं ही रह गई है, और आज के युग मैं त्याग करने वाला शायद कुछ मुश्किलों मैं भी रहे, किन्तु अपने छोटे से छोटे त्याग से वह अपनों के चेहरे पर सदा के लिए खुशियाँ ला सकता है और खुद भी जब अपना आत्म विश्लेषण करेगा तो अपने आप मैं आत्म सुख का अनुभव करेगा !

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (20 votes, average: 4.60 out of 5)
Loading ... Loading ...

64 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

JAMALUDDIN ANSARI के द्वारा
January 9, 2012

सचिन जी, नमस्कार! आपने ने जिस तरह से पुरानी यादो को ताजा किया वह वाकई बहुत पसंद आया ,ऐसे ही पुरानी यादों में सराबोर करने की कोशिश करते रहिये . धन्यवाद

    allrounder के द्वारा
    January 9, 2012

    नमस्कार जमालुद्दीन अंसारी जी, आपको हमारी कोशिश पसंद आई इसके लिए आपका हार्दिक आभार ! आगे भी प्रयास जारी रहेगा धन्यबाद !

    jigyasa के द्वारा
    May 21, 2012

    इंग्लिश कल्चर का प्रभाव है, आप देखते ही है की बर्थडे पार्टी कैसे मनाई जाती है, सिर्फ लेना ही लेना मोमबत्तिया को बुझाना जो हमारे कल्चर में नहीं है पर भेड़चाल , जैसे सब करते है वैसे ही, एक आदत बन गयी है

    allrounder के द्वारा
    June 4, 2012

    सहमत हूँ आपकी बात से ! विचार देने के लिए आपका हार्दिक आभार !

jlsingh के द्वारा
December 16, 2011

सचिन जी, नमस्कार! आपने विज्ञापनों से प्रेमचंद को उभारा! मैं आपकी सृजनशीलता को नमन करता हूँ. अमिता जी की प्रतिक्रिया से प्रेरित एक शेर मुझे याद आ गया जिसे मैं यहाँ उधृत करना चाहता हूँ. तिफ्ल (बच्चे) को कैसे ऐतवार हो, माँ बाप के इमान की. दूध बंद डिब्बे का है, तालीम इंगलिस्तान की. बाकी आपने सारी बातें कह दी है. ये कहाँ जा रहे हैं ………

    allrounder के द्वारा
    December 16, 2011

    जे एल सिंह जी आपका बहुत – बहुत आभार आलेख पर विचार देने और तार्किक शेर पेश करने के लिए !

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
December 15, 2011

भले ही मन का पंछी अकेला हो किन्तु जे जे पर तो मेला ही मेला है फिर मन कहाँ अकेला है.. प्रिय सचिन भाई बहुत अच्छी लगी .. आप की प्यारी प्रतिक्रिया …जय श्री राधे .. सच में आनंद …उल्लास ..जोश ..विचार ..प्रवाह ..मंथन …. आइये यों ही कुछ कमाल धमाल छक्के ….. भ्रमर ५

    allrounder के द्वारा
    December 15, 2011

    बिलकुल भ्रमर जी, कमाल, धमाल तो ठीक है मगर चौके छक्के कहाँ से लगायें ये प्रतिक्रिया तो मैंने किसी और की पिच पर लगाईं थी, और ये पसंद आ गई आपको, कहीं मैंने आपको भी तो यही प्रतिक्रिया नहीं चिपका दी ?

sumandubey के द्वारा
December 15, 2011

सचिन जी नमस्कार , साहित्य से लगाव होने के नाते आज ये कहानी देखी प्रेम चंद मेरे पसंद दीदा लेखक थे जहा तक मुझे लगता है ये समाज हमारा ही अक्स है आज इन कहानी का मोल इसलिए नही क्यों की कथनी -करनी में अंतर है. जब त्याग हमारे अन्दर होगा तो ही बच्चो को सिखायेगे बस सभी को पैसे से मतलब है वो पति बेटा बेटी कैसे कमा रहे है इससे नहीं हर माँ-बाप बच्चो को अपने लिए दोष देता है पर जब उसकी बारी थी तो उसने कितना किया यह नहीं सोचता जब तक -पर उपदेश कुशल बहुतेरे- वाली भावना से हम ऊपर नही उठते तब तक इस कहानी का आज के समय में कोई मोल नहीं है .

    allrounder के द्वारा
    December 15, 2011

    नमस्कार सुमन जी, प्रेमचंद जी एक ऐसे महान कथाकार थे जिनकी कहानियों मैं जीवन का सत्य छिपा है, और उनकी कहानिया हमारे अंतर्मन मैं गहरी उतर जाती हैं इसीलिए साहित्य से प्रेम करने वाले हर पाठक के पसंदीदा हैं ! आपने सही कहा की हर व्यक्ति बच्चों को दोष देता है और उनसे अपेक्षा रखता है जबकि उसने अपने माँ – बाप के लिए क्या किया इसका मुल्यांकन कर लेना चाहिए ! बाबजूद इसके त्याग ऐसा नैसर्गिक गुण है जिसका बीज यदि बचपन से बोया जाए तो समय आने पर यह उत्तम पौधा बनकर इंसान को ठंडी छाया प्रदान करेगा ! आपके विचारों के लिए आपका हार्दिक आभार सुमन जी !

manoranjanthakur के द्वारा
December 15, 2011

कहानी में खाश है या आपकी लेखनी में बहुत बधाई

    allrounder के द्वारा
    December 15, 2011

    भाई मनोरंजन जी, आपका बहुत – बहुत धन्यबाद प्रशंशा के लिए !

Shailesh Kumar Pandey के द्वारा
December 14, 2011

सचिनदेव जी सादर अभिवादन ! आपका निष्कर्ष और आपका सुझाव प्रशंसनीय है | सुन्दर और शिक्षाप्रद रचना के लिए हार्दिक बधाई |

    allrounder के द्वारा
    December 15, 2011

    आपका हार्दिक आभार शैलेश जी , उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए !

Rajkamal Sharma के द्वारा
December 11, 2011

सचिन भाई …… नमस्कारम ! आपके द्वारा दिए गए जवाब से यह बात साफ़ हो गई है कि आप असल में ही मेरे शुभचिंतक है ….. कई बार दिखने को तो हमे “दो बोल” बहुत ही साधारण से दिखाई देते है …. लेकिन उनकी खासियत सुनने वाले पर निर्भर करती है और “खास वक्त” पर भी ….. इस लिहाज से आपका हार्दिक शुक्रिया ….

    allrounder के द्वारा
    December 11, 2011

    नमस्कार राजकमल भाई, बहुत – बहुत धन्यबाद आपके इन सम्मानपूर्ण शब्दों के बारे मैं क्या लिखूं मैं ? बाकी ये बात सही है रजनीकांत और राजकमल दोनों ही अपने – अपने क्षेत्र मैं बहुत पोपुलर हैं, और मेरी फिर से यही शुभकामना है की ये दोनों सदा यों ही पोपुलर रहें !

    allrounder के द्वारा
    December 10, 2011

    नमस्कार अमिता जी, मैं आपके विचारों से सहमत हूँ आजकल के बच्चे जिस प्रकार के परिवेश मैं पल – बढ़ रहे हैं वे बदल चुके हैं, इसका असर उनकी सोच पर तो आता ही है ! अपने जेहन मैं आने वाली कहानी और अपने विचार देने के लिए आपका हार्दिक आभार अमिता जी !

abodhbaalak के द्वारा
December 10, 2011

सचिन भाई वो कहानी तो ऐसी थी की उसे हम जीवन भर नहीं भूल सकते, पर आपने जो इन दोनों के बीच का अंतर दिखाया है वो …………….. ऐसा आप जैसा लेखक ही कर सकता है . बहु खूबसूरत रचना, http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    allrounder के द्वारा
    December 10, 2011

    आपका बहुत – बहुत धन्यबाद अबोध भाई, लेख पर अपने विचार देने के लिए !

    div81 के द्वारा
    December 10, 2011

    सचिन जी एक बार फिर से देरी के लिए क्षमा चाहूंगी जिस विज्ञापन का आप ने जिक्र किया है उसको पहली बार जब मैंने देखा था तो यही बात दिमाग में आई थी कि बच्चे अपनी मासूमियत से नहीं अब अपनी चालाकी से मन लुभा रहे है | बच्चो में जो चालाकी का विकास हुआ है इसके पीछे का कारण एकल परिवार ही है जहाँ संयुक्त परिवार में बच्चे बडो कि छत्रछाया में पलते थे और संस्कार पाते थे | वहीँ एकल परिवार के बच्चो में संस्कारो का आभाव होता है | अच्छी पोस्ट के लिए बधाई

    allrounder के द्वारा
    December 10, 2011

    दिव्या जी देरी के लिए क्षमा मांग कर हमें शर्मिंदा मत करें हम आपकी इस लेट लतीफी के बारे मैं अच्छी तरह जान चुके हैं इसलिए कोई समस्या वाली बात नहीं है ! आपके उत्तम विचारों के लिए आपका हार्दिक आभार दिव्या जी !

    abodhbaalak के द्वारा
    December 11, 2011

    waise दिवा जी, एक बार फिर से हमसे …………… :( इंतज़ार ही रहता है हमें तो ……….. खैर जाने दें, हमने भी शिकायत ………….. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    allrounder के द्वारा
    December 11, 2011

    दिव्या जी आपकी लेट लतीफी के शिकार साथियों की संख्या बढती जा रही है ! वैसे अबोध एक्सस्प्रेस भी काफी ……….. रहती है मगर ये पक्का है स्टेशन पर आती जरुर है …… मगर दिव्या एक्सप्रेस तो कभी – कभी ???

Rajkamal Sharma के द्वारा
December 8, 2011

प्रिय सचिन भाई ….. नमस्कारम ! आपने तो “फर्स्ट किस मी देन किल मी” फिल्म का डायलाग दोहरा दिया है :- “अख्खा दुनिया में इस काम को सिर्फ दो आदमी ही कर सकते है एक रजनीकांता और दूसरा जैकी चेन” मुबारकबाद और शुभकामनाये जय श्री राधे कृष्ण :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :|

    allrounder के द्वारा
    December 8, 2011

    जय श्री राधाकृष्ण राजकमल भाई ! रजनीकांत जी को बहुत – बहुत शुभकामनाये उन्होंने दोबारा शूटिंग शुरू कर दी है भगवान करे ऐसी गुगली रजनी कान्त और राजकमल सदा मारते रहें !

dineshaastik के द्वारा
December 8, 2011

सचिन जी, आपको एवं आपकी लेखनी को शत-शत प्रणाम, सच कहूँ आपकी रचना ने इतना अधिक भावुक कर दिया कि प्रसंशा के लिये उपयुक्त शब्दों का चयन करना कठिन प्रतीत हो रहा है। 

    allrounder के द्वारा
    December 8, 2011

    दिनेश जी, ये कहानी है ही इतनी भावुक की जिसे पढ़कर कोई भावुक हुए बिना नहीं रह सकता, क्योंकि भावुकता ही हम भारतीयों की पहचान रही है ! आपका हार्दिक आभार अपने उत्तम विचार देने के लिए !

December 7, 2011

सचिन जी, सादर नमस्कार ! चूंकि कहानी ‘परम आदरणीय प्रेमचंद’ जी की है तो इस पर मैं ख़ुद को कोई प्रतिक्रिया देने लायक नहीं मानता और शायद कभी हो भी नहीं पाऊँगा । हाँ….ये एक कटु-सत्य है कि आजकल त्याग की भावना बिल्कुल लुप्त होती जा रही है । इसके लिए निश्चित रूप से बचपन में दिये गए संस्कार ही ज़िम्मेदार होते हैं । आपका कोटिशः आभार…..इसे मंच पर रखने के लिए !! :)

    allrounder के द्वारा
    December 7, 2011

    नमस्कार संदीप जी, महान कथाकार प्रेमचंद जी के समकक्ष पहुँच पाना या उनकी कहानियों पर प्रतिक्रिया देना सूरज को रौशनी दिखाने जैसा ही होगा, ये उन जैसे महान कथाकार की कहानी का जादू ही है जो मुझे अभी तक अपने मोह मैं बांधे हुए है ! और त्याग और स्नेह की इस अनूठी कहानी को भुला पाना मेरे बस मैं नहीं है ! अपने विचार देने केलिए आपका हार्दिक आभार संदीप जी !

Rajkamal Sharma के द्वारा
December 7, 2011

प्रिय सचिन भाई …..नमस्कारम ! मेरी यह कमेन्ट रूपी बाल एक ही समय में यार्कर है गुगली भी है अगर आउट स्विंगर है तो इनस्विंगर भी है आप जैसे हरफनमौला खिलाड़ी से इसको सहजता से खेलने की आशा रखे हुए था मैं लेकिन आपने इसको चुपचाप अंदर की तरफ जाने दिया ….. वैसे किसी ने इसको देख कर वाह कहा तो किसी के श्री मुख से आह निकली किसी ने अट्हास किया तो किसी का रोना ही निकल गया ….. किसी ने अपने बाल धुनें तो किसी ने अपने बाल नोचे …. किसी ने सराहा तो किसी ने अपने हाथों में छुपा कर पत्थर रख लिए की बच्चू करते है तुमसे हिसाब बराबर – हा हा हा हा हा हा वैसे यह बाकि के सभी ब्लागरो के कमेन्ट रूपी खिलोनों के मुकाबले में असरदार चिमटा साबित होगा ….. हा हा हा हा हा हा तो यही है आपकी उस दिन वाली गंभीर पोस्ट …. आपकी मेहनत को सलाम ! औए मुंशी प्रेम चंद जी को श्रधा सुमन ! शुभकामनाये और मुबारकबाद :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :|

    allrounder के द्वारा
    December 7, 2011

    नमस्कारम राजकमल भाई आपकी योर्कर/गुगली/इनस्विंगर कम आउट स्विंगर को मैंने समझ लिए था इसलिए आराम से बेक टू द बोलर खेल दिया था ! वैसे इस तरह की खतरनाक गेंद इंडिया मैं दो ही आदमी फेंक सकते हैं एक रजनी कान्त और एक राजकमल ! आपके इस चिमटा रूपी कमेन्ट के लिए आपका हार्दिक आभार भाई !

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
December 7, 2011

प्रिय सचिन भाई सुन्दर ..दादी के साथ हमारी भी आँखें नम हो गयी ..सच अब ये सब दूर होता जा रहा है कहाँ रहा त्याग वलिदान ..घर प्रेम संयुक्त परिवार ….ये कहानी पढ़ी तो थी पर इस समय जेहन में गम थी …आभार याद कराने के लिए … भ्रमर ५ अब रोटी सेंकते बक्त कभी भी आपकी उँगलियाँ नहीं जलेंगी ! अपने पोते की बात सुनकर बूढी दादी की ऑंखें डबडबा उठीं, दादी अपने पोते के प्यार से भाव बिभोर हो उठी और हामिद को अपने कलेजे से लगा लिया ! बेटा इतने बड़े मेले मैं भी तू अपनी बूढी दादी को नहीं भूला ! और अपनी खुशियों का त्याग करके तुझे तेरी बूढी दादी की उँगलियों को जलने से बचाने के लिए चिमटा खरीद लाया

    allrounder के द्वारा
    December 7, 2011

    आपका बहुत – बहुत आभार भ्रमर जी , आपको त्याग और बलिदान की ये कहानी अच्छी लगी उसके लिए धन्यबाद !

rahulpriyadarshi के द्वारा
December 7, 2011

तेन त्यक्तेन भुन्जिथः….जो त्याग करेगा,वही भोग का सुख पायेगा,जिंदगी का मधुर सत्य. आपका लेख बहुत सुखद लगा.

    allrounder के द्वारा
    December 7, 2011

    बिलकुल सही कहा भाई राहुल जी आपने सच्चा सुख त्याग मैं ही है ! आपका बहुत – बहुत धन्यबाद विचार देने के लिए !

Abdul Rashid के द्वारा
December 7, 2011

सचिन जी नमस्कार ऐसी घटनाएं जब भी सुनता हूँ तो मुझे ये कहानी याद आती है और सोचता हूँ जब नन्हा सा हामिद अपना एक मात्र रुपया भूखा प्यासा रहकर, अपनी खुशियों को त्याग कर अपनी दादी की परेशानी दूर करने के लिए त्याग कर सकता है तो फिर क्यों आज के कई लोग माँ – बाप और अपने बुजुर्गों के लिए त्याग तो दूर उनका ही त्याग कर रहे हैं यादो को तजा करने और भावपूर्ण रचना के लिए हार्दिक बधाई http://singrauli.jagranjunction.com

    allrounder के द्वारा
    December 7, 2011

    नमस्कार अब्दुल राशिद जी, लेख पढ़कर आपकी भी बचपन की यादें ताजा हुईं ये जानकार हार्दिक प्रसन्नता हुई ! रचना पर अपने विचार देने के लिए आपका हार्दिक आभार आपका !

vinitashukla के द्वारा
December 7, 2011

सचिन जी, नयी पीढी वैसे भी बहुत आत्केंद्रित है, उस पर प्रचार माध्यम, सोने में सुहागा का कार्य कर रहे हैं उनकी विचारधारा को दूषित करने की दिशा में. एक बेहतरीन पोस्ट पर बधाई.

    allrounder के द्वारा
    December 7, 2011

    विनीता जी आपका बहुत – बहुत धन्यबाद अपने उत्तम विचार लेख पर देने के लिए !

krishnashri के द्वारा
December 7, 2011

महोदय , प्रेम चंद तो प्रेम चंद हैं उनका कोई सामानांतर नहीं है ,उनकी कहानियां केवल कहानियां भर नहीं है बल्कि जीवन की वास्तविकता भी हैं, जरुरत भी हैं . आज की पीढ़ी को पढ़ने केलिए आपने जो उद्धृत किया उसके लिए धन्यवाद .

    allrounder के द्वारा
    December 7, 2011

    नमस्कार कृष्नाश्री जी , सच कहा आपने महान कथाकार प्रेमचंद जी के समानांतर कोई नहीं हो सकता उनकी कहानी मैं जीवन की तो सत्यता है ये उसी की बजह है जो बचपन मैं पढ़ी कहानी आज भी हमारे जेहन पर असर करती है ! प्रोत्साहन के लिए आपका हार्दिक आभार !

minujha के द्वारा
December 7, 2011

सचिन जी नमस्कार इस अदभूत कथा के साथ ,आजकल की स्थिति को जोङकर आपने जो मुद्दा उठाया है,वो निसंदेह गंभीर और शोचनीय विषय है बच्चे तो बस वही कर रहे है,जो वो हमे करते  देखते है,अब हर कीमत पर हमें बदलना ही होगा अच्छे आलेख के लिए धन्यवाद

    allrounder के द्वारा
    December 7, 2011

    नमस्कार मीनू जी , आपने सही कहा बच्चे वही कर रहे हैं जो वो हमें करते देखते हैं, कहते हैं बच्चे का मस्तिष्क कोरी स्लेट की भांति होता है उसपर जो भी अंकित कर दो वही लम्बे समय तक वह याद रखता है ! आपके उत्तम विचारों के लिए हार्दिक आभार आपका !

shashibhushan1959 के द्वारा
December 7, 2011

मान्यवर सचिन जी, सादर. आपने कथा सम्राट प्रेमचंद जी की कहानी के माध्यम से जो सन्देश प्रेषित किया है, उसके लिए हार्दिक धन्यवाद. आज के माता-पिता को यह सोचना चाहिए की उनका बच्चा रेस का घोड़ा नहीं है, जो वे पीछे से हमेशा ललकारते रहें कि और तेज…….और तेज….. ! इसी तेज दौड़ने या दौडाने कि ललक ने मानवीय संवेदनाओं का सबसे ज्यादा ह्रास किया है. ऐसी ही रचनाओं की आवश्यकता है. बहुत आभार.

    allrounder के द्वारा
    December 7, 2011

    नमस्कार शशिभूषण जी सही कहा आपने आज के बच्चों को भी त्याग और बलिदान की ऐसी कहानियों से रूबरू कराने की आवश्यकता है, जिससे उनमे त्याग की भावना पनपे ! आपके अनमोल विचारों के लिए हार्दिक आभार !

Santosh Kumar के द्वारा
December 7, 2011

सचिन भाई जी ,.सादर नमन ईदगाह के साये में आपके अनमोल विचार बहुत ही अच्छे लगे ,…बाजारवाद के बोझ में सभी भावनाए सभी संवेदनाये दब रही हैं ,..बहुत बहुत आभार

    allrounder के द्वारा
    December 7, 2011

    नमस्कार संतोष भाई, सही कहा आपने भौतिकतावाद के इस युग मैं भावनाएं सिर्फ किताब के पन्नों पर ही रह गई हैं ! आपका हार्दिक आभार विचार देने के लिए !

rameshbajpai के द्वारा
December 7, 2011

प्रिय श्री सचिन जी यह पोस्ट पढ़ कर मै गदगद हो गया | चिंतन की यह धार सृजन के विविध आयामों को विखेरती है | परिवेश व ,मानवीय मूल्यों का बाजारीकरण करने वालो का त्याग .स्नेह ,आदर्शो से भला क्या वास्ता | ” आज के युग मैं त्याग करने वाला शायद कुछ मुश्किलों मैं भी रहे, किन्तु अपने छोटे से छोटे त्याग से वह अपनों के चेहरे पर सदा के लिए खुशियाँ ला सकता है ” हार्दिक शुभकामनाये , जागरूकता की यह अलख बचपन के उस हामिद को खोने नहीं देगी जिसे हम सब ने अपनी अम्मी के लिए जिया है | ये भाजिगर तो बस चिमटे का व्यवसाय ही करेगे इनका हामिद की अम्मी की जली उंगलियों से क्या वास्ता | ५/५

    rameshbajpai के द्वारा
    December 7, 2011

    कृपया ‘ये बाजीगर ‘पढ़े

    allrounder के द्वारा
    December 7, 2011

    आदरणीय बाजपेई जी, सादर प्रणाम, ज्यादा से ज्यादा पाने और अपने पास जो है उसे दूसरों से बचा कर रखने की संस्कृति ही आज कई प्रकार की सामाजिक बुराइयाँ उत्पन्न कर रही हैं मेरे विचार से ! आलेख पर आपके आशीर्वाद स्वरुप आपकी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार !

    allrounder के द्वारा
    December 7, 2011

    धन्यबाद बाजपेई जी !

akraktale के द्वारा
December 6, 2011

सचिन जी नमस्कार, बात तो बिलकुल सही है, इस प्रकार के विज्ञापन भले बच्चे की मासूमियत दिखाने के उद्देश्य को लेकर बनाए गए हों मगर ये अन्य बच्चों के जिद का कारण भी बन ही सकते हैं. जिस परिवार पर यह फिल्माया गया है उस स्तर पर तो यही होगा वरना तो मुझे याद है अपना बचपन जब कोई भी खाने की वस्तु लाने पर सभी भाइयों में बांटकर ही खानी होती थी.साधुवाद.

    allrounder के द्वारा
    December 7, 2011

    नमस्कार रक्तले जी, आपकी बात से मैं सहमत हूँ ये विज्ञापन जिस परिवार के वारे मैं दिखाया गया है उनके स्तर पर तो त्याग का कोई मूल्य है ही नहीं ! और बचपन मैं भाई बहनों के साथ बस्तु को मिल बाँट कर खाने मैं जो सुख था उसकी अनुभूति आज भी होती है ! अपने उत्तम विचार देने के लिए हार्दिक आभार आपका !

December 6, 2011

सचिन भाई नमस्कार…बहुत ही बढ़िया विश्लेषण आपने किया है आज के स्वार्थ और अतीत के त्याग के  बारे में…अब तो बस लेते रहो…देने को तो कोई सिखाता ही नहीं बच्चों को….बहुत बहुत बधाई …हाँ राजकमल भाई का यही कमेंट लगता है ग़लती से हमारे ब्लॉग पर भी पोस्ट हो गया है

    allrounder के द्वारा
    December 7, 2011

    नमस्कार सूरज जी सच कहा आपने आज लेने की संस्कृति त्याग पर बुरी तरह से हावी होती जा रही है, त्याग की प्रवित्ति मनुष्य को अच्छा नागरिक बनाती है ! आपक बहुत – बहुत धन्यबाद विचार देने के लिए ! और राजकमल भाई का ये कमेन्ट गलती से नहीं आया बल्कि उनका ये कमेन्ट योर्कर, गुगली आल इन वन था !

alkargupta1 के द्वारा
December 6, 2011

सचिन जी , बहुत ही बढ़िया कहानी है यह और मुझे लगता है कि बचपन में अधिकाँश लोगों ने पढ़ी होगी मैं भी यह कहानी अपने छात्रो को पढ़ा चुकी हूँ……बच्चे की भावनाओं से जुडी संदेशात्मक कहानी है…|

    allrounder के द्वारा
    December 6, 2011

    अलका जी आपका हार्दिक आभार विचार देने के लिए !

Rajkamal Sharma के द्वारा
December 6, 2011

आपने तो मुझको निशब्द कर दिया है वाह ! वाह ! आह ! आह ! खुशी से आंसू निकले जा रहे है …. मुबारकबाद और शुभकामनाये :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :|

    allrounder के द्वारा
    December 6, 2011

    नमस्कारम राजकमल भाई लगता है आजकल कोई नई तकनीक विकसित कर ली आपने एक ही प्रतिक्रिया सारे ब्लॉग पर पोस्ट करने की और भाई तुम्हारे इतने सारे हँसते रोते साथी देखकर समझ नहीं आ रहा आप हंस रहे हो या रो रहे हो, इन्हें देखकर और आपकी प्रतिक्रिया पाकर मेरे भी आंसू नक़ल आये भाई !

nishamittal के द्वारा
December 6, 2011

सचिन ये मेरी भी पसंदीदा कहानियों में से एक रही है जिसमें नन्हे बच्चे की भावनाओं का बहुत सुन्दर चित्रण प्रेमचंद जी ने किया.

    allrounder के द्वारा
    December 6, 2011

    निशा जी आपका बहुत -बहुत धन्यबाद ! निसंदेह ये कहानी इतनी प्रेरणास्पद है की हर किसी के दिल को छू जाती है !

roshni के द्वारा
December 6, 2011

सचिन जी नमस्कार , आपकी इस कहानी ने हमे भी बचपन की याद दिला दी क्युकी हमने भी इसे बचपन मे पढ़ा था .. त्याग और प्यार की जो भावना इस कहानी मे वोह आज के बच्चो मे नहीं .. आज बच्चे किसी के साथ कुछ भी बतना नहीं चाहते .. इसका भी कारन है क्युकी आज एकल परिवार है और इसलिए अकेले ही रहने खाने की आदते बन गयी है .. और बच्चे तो यु भी आजकल के जितने सयाने है उतना तो कोई नहीं .. सुंदर कहानी के साथ comparison किया अपने आभार

    allrounder के द्वारा
    December 6, 2011

    नमस्कार रौशनी जी, आपका बहुत बहुत धन्यबाद अपने विचार देने के लिए और चलो बहुत अच्छा हुआ कम से कम ये कहानी पढ़कर आपको बचपन की याद भी आई !


topic of the week



latest from jagran